फिल्म देखने के बाद कई दर्शकों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कीं। हालांकि, शुरुआती रुझान बताते हैं कि फिल्म दर्शकों को प्रभावित करने में विफल रही है। आइए जानते हैं दर्शकों का क्या कहना है:
दर्शकों की प्रतिक्रियाएं:
- “नाकाबिल-ए-बर्दाश्त” अनुभव: एक दर्शक ने फिल्म को “असहनीय” (UNBEARABLE) करार देते हुए लिखा, “निर्देशक सुधा कोंगरा की कोशिश तो दिखती है, लेकिन कमजोर लेखन ने इसे एक निराशाजनक फिल्म बना दिया है। लगातार बढ़ा-चढ़ाकर किया गया प्रेजेंटेशन, चीख-पुकार और बेवजह का बिल्ड-अप दर्शकों को चिढ़ाता है। फिल्म का क्रियान्वयन (execution) त्रुटिपूर्ण है। देखने की सलाह बिल्कुल नहीं।”
- उबाऊ और लंबी कहानी: एक समीक्षक ने विस्तार से लिखा, “एक उबाऊ पीरियड ड्रामा जिसकी नीयत तो ईमानदार है, लेकिन थका देने वाला और लंबा वर्णन आपके धैर्य की परीक्षा लेता है! फिल्म शुरुआत में अपने प्रामाणिक पीरियड सेटअप (1960 के दशक का माहौल) से ध्यान खींचती है। हालांकि, धीमी कहानी और नीरस लव ट्रैक पहले हाफ पर हावी रहते हैं। इंटरवल के बाद फिल्म अंतहीन रूप से खिंचती है, जहां सुविधाजनक लेखन और खींचे हुए सीक्वेंस धैर्य की परीक्षा लेते हैं। भाषा आंदोलन से जुड़ी भावनाएं सतही लगती हैं और प्रभावी ढंग से दिल को नहीं छू पातीं।”
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